आजकल की ज़िन्दगी

हर रंग से तो मिल चुके हैं हम
फिर क्यों बेरंग सी लगती है ये ज़िन्दगी
हर आँसूँ तो बहा चुके हैं हम
फिर क्यों प्यासी सी लगती है ज़िन्दगी

मंज़िल तो आज भी दिख रही है
बस रुकावटें ख़त्म होने की देर है
सपने तो आज भी देख रहे है
बस उन्हें पुरे करने की देर है

हज़ारों नज़्म पढ़े हैं हमने
मगर अल्फ़ाज़ों की कमी तो आज भी है
कई मुसाफिरों से मिल चुके हैं हम
मगर अपनो की कमी तो आज भी है

क्यों रोए एक रिश्ते के टूट जाने से
तमाम रिश्तों से बढ़कर थी वो, कह कर मना ना ले
क्यों कहे खुद से कि हसना भूल गए हैं
वक़्त नहीं मिलता, कह कर टाल ना दे

एक और दिन ही तो मांगा था
कह दिया होता रात हो गयी है
बस एक मुलाकात ही तो चाहा था
कह दिया होता कि तुम यहाँ, और गाड़ी आगे निकल चुकी है

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