कहानियां और किस्से

वो कहानी था चलता रहा, मै किस्सा थी ख़त्म हो गयी |
वो कहानी था जिसमे अनेको किरदार थे, मै किस्सा थी जिसमे दो ही अदाकार थे ||

कहानी बन मेरी किताब का, हर रोज़ उसे पढ़ती हूँ मैं |
किस्सा बन के दिन का, शाम होते ढल जाती हूँ मैं ||

उसकी कहानियां हर रात सुनती हूँ मैं, मेरा किस्सा तो उसी रात ख़त्म हो गया |
हम मिल जाते तो शायद कहानी बनती, हम ना मिले तभी तो किस्सा रह गया ||

मेरी सहेली

अपनी दुखों को भी हसी में उड़ा जाती है वो
थोड़ी जिद्दी है मेरी दोस्त
गलती मेरी रहती फिर भी मनाने आ जाती है वो

कभी कोई पंक्तियाँ लिख दूँ
तो हज़ारों सवाल कर जाती है वो
अगर जवाब न दूँ मैं
तो फिर आंसूं निकाल भावुक हो जाती है वो

मेरे पहले प्यार पे
जाने क्यों उसकी मंजूरी ना थी
मगर जब कमज़ोर होते मेरे रिश्ते
तो फिर सुलझाने लग जाती है वो

नाचना गाना तो भाता ही है
बस दर्शकों की खोज मेँ रहती है वो
मेरी तालियों की गूंज ना सुनाई दे
तो दोबारा मंच पर चढ़ जाती है वो

थोड़ी लड़ाकू है मेरी दोस्त
मुझसे लड़ने का मौका भी न छोड़ती है वो
सबसे अच्छा दोस्त कहे कोई
तो उससे भी लड़ जाती है वो

आजकल की ज़िन्दगी

हर रंग से तो मिल चुके हैं हम
फिर क्यों बेरंग सी लगती है ये ज़िन्दगी
हर आँसूँ तो बहा चुके हैं हम
फिर क्यों प्यासी सी लगती है ज़िन्दगी

मंज़िल तो आज भी दिख रही है
बस रुकावटें ख़त्म होने की देर है
सपने तो आज भी देख रहे है
बस उन्हें पुरे करने की देर है

हज़ारों नज़्म पढ़े हैं हमने
मगर अल्फ़ाज़ों की कमी तो आज भी है
कई मुसाफिरों से मिल चुके हैं हम
मगर अपनो की कमी तो आज भी है

क्यों रोए एक रिश्ते के टूट जाने से
तमाम रिश्तों से बढ़कर थी वो, कह कर मना ना ले
क्यों कहे खुद से कि हसना भूल गए हैं
वक़्त नहीं मिलता, कह कर टाल ना दे

एक और दिन ही तो मांगा था
कह दिया होता रात हो गयी है
बस एक मुलाकात ही तो चाहा था
कह दिया होता कि तुम यहाँ, और गाड़ी आगे निकल चुकी है

वापस ज़रूर आना

एक दुविधा में हूँ आज फिर मैं
क्या कल जैसा ही होगा मेरा आज

या जो वादें किये थे दिन के आखिर में
कुछ नये वैसे ही जुड़ जायेंगे बक्से में

रोज़ इसी उम्मीद में अलार्म लगाती हूँ
कि शायद कल कुछ घंटे और मिल जाये
उन घंटो में कुछ नया हो जाये

एक नहीं, दो नहीं, पांच आवाज़ों से खुद को जगाना चाहती हूँ
हर रोज़ एक नयी सुबह देखना चाहती हूँ

मगर..
मगर जाने कैसे सारी चीखें करवटों तले दब जाती है
हर सांस हर धड़कन बस एक पल की झपकी और लेना चाहती है

आखिर कैसे समझाऊं उस नासमझ को कि
तुम बस मुझे आवाज़ लगा दिया करना
अगर जवाब न भी दूँ मैं
तो चंद पलों में वापस लौट आना

थोड़ी जज्बाती सी है वो
मेरे एक डाँट पे चुप भी हो जाती है वो
जाने कौन सा रिश्ता है उससे
हर रात मनाती हूँ मैं उसे
और हर सुबह रूठ जाती है वो

एक इम्तिहान और

नीले चादर तले बैठी थी एक रोज़ मैं
थोड़ी नमी थी बादलों में
और डर था आंसुओं के छलकने का

नज़र पड़ी फिर उस सूखी सी जान पे
जिसे न कद्र थी उस भावुक से आसमान की
न खोज थी किसी मख़सूस दिशा की

इंतज़ार था तो उन आंसुओं का
जिससे आज फिर उसका इक इम्तिहान था

नीले चादर तले बैठा वो शक्श भी
शायद किसी बदले की चाह में था

रास्तों ने कोशिश तो की रास्ते दिखाने की
मगर संघर्षो ने उस मौके को भी ठुकरा दिया

बचपन की घड़ियाँ

उन कच्ची सड़कों में दोस्तों के साथ खेलना
अपने घर की छतों से पतंग को ढील देना
धुंधलाती नज़र आती है बचपन की ये तसवीरें
जाने कहाँ ले जाएंगी हाथों की लकीरें

छूटी वो अलहड़ सी अटखेलियां, छूटें वो बचपन की सहेलियां
छूट गए वह पल और बदल गयी है घड़ियाँ
आज फिर उन यादों में जीने को दिल करता है
मन का कोना उन कश्तियों में सवार होने को कहता है

वह कच्चे-टूटे बर्तन देखती हूँ जब अलमारी में
छा जाते है सारे पल जब किया था सौदा नादानी में
उंगते मुँह से कह सकती हूँ अब भी उन्हें
जी ले इस पल को वरणा चली जाएगी ज़िन्दगी लाचारी में

वो मुस्कुराहट

इन पहाड़ों में, इन हवाओं में
कहाँ ढूंढूं तेरी हंसी, तेरी वो ख़ुशी
गर खुदा के पास भी मिल जाए तेरी मुस्कुराहट
कर लुंगी ज़िन्दगी से मैं वो सौदा भी

ले चल उस खुदा के पास एक दफा मुझे
जिसने बनायीं तेरी सूरत, तेरी ये मूरत
भूल गया वो जाने क्यों तेरी हसी की जरूरत

तू ना जाने, ना जाने कोई
जब जब है मुस्कुराता तू, धड़कन है थम जाती क्यों
बता ऐ खुदा गर तू ना लौटा सके उसे
छीन लाऊंगी कही से, या दे दूंगी अपनी ख़ुशी
बस दुआ है इतनी ऐ ज़िन्दगी, चुरा ना लेना तू उसे मुझसे कहीं

बंद कमरे की खिड़की से

रात को जब झांकती हूँ मैं 
अपने बंद कमरे की खिड़की से

तो सामने दूसरी मंज़िल पर 
एक परछाई दिखती है

जो रात में अपनी किसी छोटी सी रौशनी में (जिसे हम आम भाषा में टेबल लैंप कहते है) उससे कुछ ढूंढ रहा होता है

सोचती हूँ…
क्या उसे भी मेरी तरह कागज़-कलम लिए सपनो की तलाश करने की आदत है
या अपने सपनो को पूरा करने की रफ़्तार में पुस्तकों की इमाराते बनाने का शौक

सोचती हूँ…
क्या उसे ये खबर भी है की मैं यहाँ इक राह ढूंढ रही हूँ जो मुझे उस तक पहुचाये 
क्या उसने मुझे कभी पहचाना होगा

आज बरसों बाद जब मैं अपने घर वापस उसी कमरे में गयी 
तो मुझे कुछ नज़र न आया 
रौशनी तो अब भी है वहां मगर ना कोई परछाई, ना ही कोई साया
हाँ बस इमारते बन गयी है, पुस्तकों की नहीं मगर कुछ लोगो ने वहां सुपर-मार्किट बना दिया है

लोगो ने बताया की यहाँ रहने वाले सभी लोगो का तबादला हो गया था
तो सरकार ने इस मोहल्ले को हटा कर मॉल बनाने का हुक्म दे दिया

सोचती हूँ …
क्या वो आज भी यहाँ आता होगा, 
भनक भी होगी उसे मेरे इस रवैये की

बस, 
आज भी रात को झांकती हूँ मैं 
अपने बंद कमरे की खिड़की से

मेरी पहली कहानी, मेरी जुबानी

“नहीं यार, आज कहीं नहीं जाना है, आज माँ-पापा आ रहे हैं।” ना जाने आज कितनी बार बोला था मैंने, जब भी मेरे दोस्त कहीं बाहर जाने या खेलने की बात करते। दो दिन पहले ही तो बात हुई थी पापा से, कहा था इस शनिवार वे जरूर आएँगे। रात के आठ बज गए थे पर माँ-पापा का इंतज़ार ख़त्म नहीं हुआ। क्या वे आज भी नही आएँगे या शायद ट्रेन लेट होगी। हालाकी घर की दूरी बहुत नहीं है पर शायद आज उनको समय नहीं मिल पाया होगा। पापा बिज़ी होंगे काम में या माँ को फिर किसी समाज सेवा के लिए शहर से बाहर जाना पड़ गया होगा। बस इंतज़ार ही तो करती आ रही थी इतने सालों से। हर बार की तरह इस बार भी इंतज़ार ख़त्म नही हुई और समय बितता गया। सालों से बस यही सोचती थी की माँ आएगी तो उन्हें अपना कमरा दिखाउंगी , पापा को अपनी क्लासेज दिखाउंगी। कमरा भी बदल गया और क्लासेज भी पर उन्होंने कभी कॉलेज आकर मेरा हाल नहीं पूछा। आखिर क्या वजह रही होगी। छुटियों में घर जाती हूँ तब तो सब सही लगता है। न ही कोई बहुत बिज़ी रहता है न कुछ परेशानियां दिखती है। फिर मेरे माँ-पापा मुझसे मिलने कभी क्यों नहीं आते। बचपन से आज तक लोग बस मुझे छेड़ते है कि सभी भैया को मुझसे ज्यादा प्यार करते है इसलिए तुम्हारी चीज़े भी उसे मिल जाती है। क्या वे लोग सच कहते थे। न जाने ऐसे कितने सवाल मन में आ रहे थे, पर मुझे क्या पता था की ये सब सोचना ही बेकार था जब कोई ऐसी बात ही नहीं थी।

यही सोच कर कब रात हो गयी और मैं सपनो मे चली गयी पता नहीं। हर बार की तरह पिछली बार भी दीवाली में घर गयी और काफी मस्ती भी की। मगर इस बार तो मुझे कॉलेज में ही रुकना था। हमारी ट्रिप जो लगी थी वो भी गर्मी की छुटियों में पुरे दो महीने के लिए। माँ तो काफी परेशान थी कि मैं नए शहर जा रही हूँ, वहां का पानी सूट नहीं किया तो? मैं बीमार पड़ गयी तो? बस इन्हीं डर के साथ उन्होंने मुझे एअरपोर्ट से विदा किया।

हलाकि छुटियों में काफी लोग रुकने वाले थे शायद इसलिए माँ को थोड़ी राहत मिली। इतनी चिंता तो है इन्हें मेरी, फिर कभी कॉलेज क्यों नहीं आये वो।

“अरे, अब तक सो रहे हो, चलो स्कूल के लिए देर हो रही है, जल्दी से उठ के रेडी हो जाओ।”, हर रोज़ ना जाने कहाँ से माँ को समय का पता चल जाता था और बिना घड़ियों की तरफ देखे बस स्टॉप पर हमे टाइम पर छोड़ आती थी। हर रोज़,”अरे मेरी गाड़ी की चाभी कहाँ है?”, “मा, मेरी मैथ्स की कॉपी कहाँ है?”, “बेटा, मेरा चश्मा देखा है क्या?”, “अरे दादा-दादी के लिए गरम रोटियां बनानी है।”, “मेरी ऑफिस वाली फ़ाइल कहाँ रखी है तुमने?”, इतना तो पापा को भी पता होता था कि फ़ाइल माँ ने नहीं, खुद उन्होंने ही रखी थी। कहाँ से इतने कम समय मे सारे काम हो जाते थे मानो कि भगवान ने माँ को अनेकों हाथ दिए हो।

ये सारे सपने थे या मैं किसी सोच के किनारे थी पता नहीं, तभी अचानक फ़ोन की घंटी बजी। सुबह हो चुकी थी, चिड़ियों की चहचाहट भी ऐसी थी मानो उसने भी पूरी रात युहीं इंतज़ार में गुज़ार दी हो। सोचा पापा का फ़ोन होगा, जब तक नींद टूटी, दौड़ कर भागती, फ़ोन की घंटी ने भी थक कर चुप्पी ले चुकी थी। पर इस बार बिना इंतज़ार किये फिर घंटी बजी और सामने से कोई घर के पास वाले चाचा की आवाज़ आई-“बेटा, पापा ने घर जल्दी बुलाया है, अगली ट्रेन पकड़ कर आ जाओ।” मैं कुछ कह पाती इससे पहले फ़ोन की तार कट गयी।

अब तो जैसे ट्रेन नहीं हवाई जहाज़ से ही चली जाऊँ। तीन दिन पहले ही तो बात हुई थी पापा से, कॉलेज ही आने वाले थे, फिर ऐसी क्या बात हुई जिसकी वजह से वो आये ही नहीं और घर भी बुला लिया। शाम की अगली ही ट्रेन से निकल पड़ी मैं। ट्रेन में भी बेचैनी, धड़कने तो जैसे ट्रेन की ही रफ़्तार पकड़ चुकी थी। अब तो घर पहुचने का ही इंतज़ार कर सकते थे बस।

घर पहुँची तो पूरी तामझाम लगी हुई थी। एक बार तो लगा जैसे किसी की शादी हो। कहीं भैया की शादी में मुझे सरप्राइज देने के कारण तो नहीं बुलाया। पर मुझे कहाँ पता था इस सदी की सोच अब तक नहीं बदली। वहां पहुच कर उसी चाचा ने कहा-“आओ बेटी, सब तुम्हारा ही इंतज़ार कर रहे थे। दिमाग ने तो अब जैसे सोचना ही छोर दिया था।

फिर यादों का पन्ना पीछे पलटा तो देखा कुछ महीने पहले पापा ने एक तस्वीर मांगी थी मुझसे, कहा था “कई दिनों से तुझे देखा नहीं तो अपनी तस्वीर ही भेज दे।” कहाँ पता था मुझे कि उस तस्वीर के पीछे इतनी बड़ी कहानी भी हो सकती है। अब तो मेरे चेहरे की मासूमियत कहो या गुस्से की पोटली, सभी को साफ़ दिखाई पड़ रहा था कि मैं इस शादी से खुश नहीं हूँ। दिमाग तो बार बार कह रहा था कि फिर अगली हवाई जहाज़ पकडूं और चल दूँ वापस। पर माँ की आँखों की चमक व आशा और घर के हालात देख कर चुप रह गयी।
जब याद आते है वो बचपन जब बिना मांगे, बिना कुछ बोले माँ को समझ आ जाता था कि मुझे कब भूक लगी है, मुझे खाने में क्या पसंद है, क्या नहीं। पापा बिना किसी की फ़िक्र किये हमारे लिए चॉकलेट्स और खिलौने लाते थे, हाँ कभी पैसों की मारामारी से खिलौनेे या चॉकलेट्स छोटे जरूर हो जाते थे पर ख़त्म कभी नहीं हुए। कभी गर्मियों में माँ की गोद में सोकर उस कच्चे बांस के पंखे की हवा से मानो हम किसी और ही दुनिया में चले जाते थे जहाँ कोई नहीं होता था मेरे और उनके सिवा। तो कभी पापा के कन्धों पे चढ़कर ऐसा लगता जैसे सबसे ऊँची चोटी पर तो हम है, फिर लोग पर्वतों पर क्यों जाते हैं।

तो क्या इन सारे पलों और कुर्बानियों को बस एक यादों के डिब्बे में बंद कर भूल जाए हम? या कहीं इन्हीं कुर्बानियों की कीमत देनी पड़ती है हमे। इन सबके बदले हम माँ-पापा की ख़ुशी के लिए अपनी ज़िन्दगी से एक छोटा सा समझौता नहीं कर सकते या फिर ये चाहिए कि वो बस हमें समझे और अपनी पूरी ज़िन्दगी हमारे लिए कुर्बान करते जाए? क्या आज ज़माना उनके लिए इतना महत्वपूर्ण हो गया है कि हमारी ज़िन्दगी का एक फैसला हम खुद नहीं कर सकते? या ये कहे कि आज हमारे लिए इन चंद 20 दिनों का प्यार उन 20 सालों के प्यार से ज्यादा बड़ा और जरूरी हो गया है?

बस यही सोचती रह गयी मैं उन तमाम भीड़ के बिच। इन सवालों के जवाब न मुझे कहीं मिल पाये न मैं दे पायी।
बस यही थी मेरी पहली कहानी, मेरी ही जुबानी।