वापस ज़रूर आना

एक दुविधा में हूँ आज फिर मैं
क्या कल जैसा ही होगा मेरा आज

या जो वादें किये थे दिन के आखिर में
कुछ नये वैसे ही जुड़ जायेंगे बक्से में

रोज़ इसी उम्मीद में अलार्म लगाती हूँ
कि शायद कल कुछ घंटे और मिल जाये
उन घंटो में कुछ नया हो जाये

एक नहीं, दो नहीं, पांच आवाज़ों से खुद को जगाना चाहती हूँ
हर रोज़ एक नयी सुबह देखना चाहती हूँ

मगर..
मगर जाने कैसे सारी चीखें करवटों तले दब जाती है
हर सांस हर धड़कन बस एक पल की झपकी और लेना चाहती है

आखिर कैसे समझाऊं उस नासमझ को कि
तुम बस मुझे आवाज़ लगा दिया करना
अगर जवाब न भी दूँ मैं
तो चंद पलों में वापस लौट आना

थोड़ी जज्बाती सी है वो
मेरे एक डाँट पे चुप भी हो जाती है वो
जाने कौन सा रिश्ता है उससे
हर रात मनाती हूँ मैं उसे
और हर सुबह रूठ जाती है वो

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