नीले चादर तले बैठी थी एक रोज़ मैं
थोड़ी नमी थी बादलों में
और डर था आंसुओं के छलकने का
नज़र पड़ी फिर उस सूखी सी जान पे
जिसे न कद्र थी उस भावुक से आसमान की
न खोज थी किसी मख़सूस दिशा की
इंतज़ार था तो उन आंसुओं का
जिससे आज फिर उसका इक इम्तिहान था
नीले चादर तले बैठा वो शक्श भी
शायद किसी बदले की चाह में था
रास्तों ने कोशिश तो की रास्ते दिखाने की
मगर संघर्षो ने उस मौके को भी ठुकरा दिया
I didn’t know u were such a good poet.
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Ha ha. Thanks 😀
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