बचपन की घड़ियाँ

उन कच्ची सड़कों में दोस्तों के साथ खेलना
अपने घर की छतों से पतंग को ढील देना
धुंधलाती नज़र आती है बचपन की ये तसवीरें
जाने कहाँ ले जाएंगी हाथों की लकीरें

छूटी वो अलहड़ सी अटखेलियां, छूटें वो बचपन की सहेलियां
छूट गए वह पल और बदल गयी है घड़ियाँ
आज फिर उन यादों में जीने को दिल करता है
मन का कोना उन कश्तियों में सवार होने को कहता है

वह कच्चे-टूटे बर्तन देखती हूँ जब अलमारी में
छा जाते है सारे पल जब किया था सौदा नादानी में
उंगते मुँह से कह सकती हूँ अब भी उन्हें
जी ले इस पल को वरणा चली जाएगी ज़िन्दगी लाचारी में

One thought on “बचपन की घड़ियाँ

  1. Mila hai wo pehchan jo hum pana chahte the..
    mila hai wo aangan jis pe hm chlna chahte the..
    toh kya hua jo chute purane dost aage aur bhi log aur aur bhi pehchan baaki h.

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