मेरी पहली कहानी, मेरी जुबानी

“नहीं यार, आज कहीं नहीं जाना है, आज माँ-पापा आ रहे हैं।” ना जाने आज कितनी बार बोला था मैंने, जब भी मेरे दोस्त कहीं बाहर जाने या खेलने की बात करते। दो दिन पहले ही तो बात हुई थी पापा से, कहा था इस शनिवार वे जरूर आएँगे। रात के आठ बज गए थे पर माँ-पापा का इंतज़ार ख़त्म नहीं हुआ। क्या वे आज भी नही आएँगे या शायद ट्रेन लेट होगी। हालाकी घर की दूरी बहुत नहीं है पर शायद आज उनको समय नहीं मिल पाया होगा। पापा बिज़ी होंगे काम में या माँ को फिर किसी समाज सेवा के लिए शहर से बाहर जाना पड़ गया होगा। बस इंतज़ार ही तो करती आ रही थी इतने सालों से। हर बार की तरह इस बार भी इंतज़ार ख़त्म नही हुई और समय बितता गया। सालों से बस यही सोचती थी की माँ आएगी तो उन्हें अपना कमरा दिखाउंगी , पापा को अपनी क्लासेज दिखाउंगी। कमरा भी बदल गया और क्लासेज भी पर उन्होंने कभी कॉलेज आकर मेरा हाल नहीं पूछा। आखिर क्या वजह रही होगी। छुटियों में घर जाती हूँ तब तो सब सही लगता है। न ही कोई बहुत बिज़ी रहता है न कुछ परेशानियां दिखती है। फिर मेरे माँ-पापा मुझसे मिलने कभी क्यों नहीं आते। बचपन से आज तक लोग बस मुझे छेड़ते है कि सभी भैया को मुझसे ज्यादा प्यार करते है इसलिए तुम्हारी चीज़े भी उसे मिल जाती है। क्या वे लोग सच कहते थे। न जाने ऐसे कितने सवाल मन में आ रहे थे, पर मुझे क्या पता था की ये सब सोचना ही बेकार था जब कोई ऐसी बात ही नहीं थी।

यही सोच कर कब रात हो गयी और मैं सपनो मे चली गयी पता नहीं। हर बार की तरह पिछली बार भी दीवाली में घर गयी और काफी मस्ती भी की। मगर इस बार तो मुझे कॉलेज में ही रुकना था। हमारी ट्रिप जो लगी थी वो भी गर्मी की छुटियों में पुरे दो महीने के लिए। माँ तो काफी परेशान थी कि मैं नए शहर जा रही हूँ, वहां का पानी सूट नहीं किया तो? मैं बीमार पड़ गयी तो? बस इन्हीं डर के साथ उन्होंने मुझे एअरपोर्ट से विदा किया।

हलाकि छुटियों में काफी लोग रुकने वाले थे शायद इसलिए माँ को थोड़ी राहत मिली। इतनी चिंता तो है इन्हें मेरी, फिर कभी कॉलेज क्यों नहीं आये वो।

“अरे, अब तक सो रहे हो, चलो स्कूल के लिए देर हो रही है, जल्दी से उठ के रेडी हो जाओ।”, हर रोज़ ना जाने कहाँ से माँ को समय का पता चल जाता था और बिना घड़ियों की तरफ देखे बस स्टॉप पर हमे टाइम पर छोड़ आती थी। हर रोज़,”अरे मेरी गाड़ी की चाभी कहाँ है?”, “मा, मेरी मैथ्स की कॉपी कहाँ है?”, “बेटा, मेरा चश्मा देखा है क्या?”, “अरे दादा-दादी के लिए गरम रोटियां बनानी है।”, “मेरी ऑफिस वाली फ़ाइल कहाँ रखी है तुमने?”, इतना तो पापा को भी पता होता था कि फ़ाइल माँ ने नहीं, खुद उन्होंने ही रखी थी। कहाँ से इतने कम समय मे सारे काम हो जाते थे मानो कि भगवान ने माँ को अनेकों हाथ दिए हो।

ये सारे सपने थे या मैं किसी सोच के किनारे थी पता नहीं, तभी अचानक फ़ोन की घंटी बजी। सुबह हो चुकी थी, चिड़ियों की चहचाहट भी ऐसी थी मानो उसने भी पूरी रात युहीं इंतज़ार में गुज़ार दी हो। सोचा पापा का फ़ोन होगा, जब तक नींद टूटी, दौड़ कर भागती, फ़ोन की घंटी ने भी थक कर चुप्पी ले चुकी थी। पर इस बार बिना इंतज़ार किये फिर घंटी बजी और सामने से कोई घर के पास वाले चाचा की आवाज़ आई-“बेटा, पापा ने घर जल्दी बुलाया है, अगली ट्रेन पकड़ कर आ जाओ।” मैं कुछ कह पाती इससे पहले फ़ोन की तार कट गयी।

अब तो जैसे ट्रेन नहीं हवाई जहाज़ से ही चली जाऊँ। तीन दिन पहले ही तो बात हुई थी पापा से, कॉलेज ही आने वाले थे, फिर ऐसी क्या बात हुई जिसकी वजह से वो आये ही नहीं और घर भी बुला लिया। शाम की अगली ही ट्रेन से निकल पड़ी मैं। ट्रेन में भी बेचैनी, धड़कने तो जैसे ट्रेन की ही रफ़्तार पकड़ चुकी थी। अब तो घर पहुचने का ही इंतज़ार कर सकते थे बस।

घर पहुँची तो पूरी तामझाम लगी हुई थी। एक बार तो लगा जैसे किसी की शादी हो। कहीं भैया की शादी में मुझे सरप्राइज देने के कारण तो नहीं बुलाया। पर मुझे कहाँ पता था इस सदी की सोच अब तक नहीं बदली। वहां पहुच कर उसी चाचा ने कहा-“आओ बेटी, सब तुम्हारा ही इंतज़ार कर रहे थे। दिमाग ने तो अब जैसे सोचना ही छोर दिया था।

फिर यादों का पन्ना पीछे पलटा तो देखा कुछ महीने पहले पापा ने एक तस्वीर मांगी थी मुझसे, कहा था “कई दिनों से तुझे देखा नहीं तो अपनी तस्वीर ही भेज दे।” कहाँ पता था मुझे कि उस तस्वीर के पीछे इतनी बड़ी कहानी भी हो सकती है। अब तो मेरे चेहरे की मासूमियत कहो या गुस्से की पोटली, सभी को साफ़ दिखाई पड़ रहा था कि मैं इस शादी से खुश नहीं हूँ। दिमाग तो बार बार कह रहा था कि फिर अगली हवाई जहाज़ पकडूं और चल दूँ वापस। पर माँ की आँखों की चमक व आशा और घर के हालात देख कर चुप रह गयी।
जब याद आते है वो बचपन जब बिना मांगे, बिना कुछ बोले माँ को समझ आ जाता था कि मुझे कब भूक लगी है, मुझे खाने में क्या पसंद है, क्या नहीं। पापा बिना किसी की फ़िक्र किये हमारे लिए चॉकलेट्स और खिलौने लाते थे, हाँ कभी पैसों की मारामारी से खिलौनेे या चॉकलेट्स छोटे जरूर हो जाते थे पर ख़त्म कभी नहीं हुए। कभी गर्मियों में माँ की गोद में सोकर उस कच्चे बांस के पंखे की हवा से मानो हम किसी और ही दुनिया में चले जाते थे जहाँ कोई नहीं होता था मेरे और उनके सिवा। तो कभी पापा के कन्धों पे चढ़कर ऐसा लगता जैसे सबसे ऊँची चोटी पर तो हम है, फिर लोग पर्वतों पर क्यों जाते हैं।

तो क्या इन सारे पलों और कुर्बानियों को बस एक यादों के डिब्बे में बंद कर भूल जाए हम? या कहीं इन्हीं कुर्बानियों की कीमत देनी पड़ती है हमे। इन सबके बदले हम माँ-पापा की ख़ुशी के लिए अपनी ज़िन्दगी से एक छोटा सा समझौता नहीं कर सकते या फिर ये चाहिए कि वो बस हमें समझे और अपनी पूरी ज़िन्दगी हमारे लिए कुर्बान करते जाए? क्या आज ज़माना उनके लिए इतना महत्वपूर्ण हो गया है कि हमारी ज़िन्दगी का एक फैसला हम खुद नहीं कर सकते? या ये कहे कि आज हमारे लिए इन चंद 20 दिनों का प्यार उन 20 सालों के प्यार से ज्यादा बड़ा और जरूरी हो गया है?

बस यही सोचती रह गयी मैं उन तमाम भीड़ के बिच। इन सवालों के जवाब न मुझे कहीं मिल पाये न मैं दे पायी।
बस यही थी मेरी पहली कहानी, मेरी ही जुबानी।

2 thoughts on “मेरी पहली कहानी, मेरी जुबानी

  1. Na milega woh pyaar na milega woh ehsaas jo apne maa ka haath pakad kr mila aur na hi milegi woh zid puri hone ki khushi jo papa k saath milti h.. toh maa papa ka faisla ho sakta h galat… aur agar hua bhi galat to kya samjhota krna tera haq ni . tmhri zid se badi unki khushi ni.. haan kiya tumne yaad .. haan hai teri kuch khwaishe hai teri kch chahate puch kr toh dekh .. teri hr zid puri hui h toh ek aur zid maam kr woh bhi puri kr di jaegi.

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