बंद कमरे की खिड़की से

रात को जब झांकती हूँ मैं 
अपने बंद कमरे की खिड़की से

तो सामने दूसरी मंज़िल पर 
एक परछाई दिखती है

जो रात में अपनी किसी छोटी सी रौशनी में (जिसे हम आम भाषा में टेबल लैंप कहते है) उससे कुछ ढूंढ रहा होता है

सोचती हूँ…
क्या उसे भी मेरी तरह कागज़-कलम लिए सपनो की तलाश करने की आदत है
या अपने सपनो को पूरा करने की रफ़्तार में पुस्तकों की इमाराते बनाने का शौक

सोचती हूँ…
क्या उसे ये खबर भी है की मैं यहाँ इक राह ढूंढ रही हूँ जो मुझे उस तक पहुचाये 
क्या उसने मुझे कभी पहचाना होगा

आज बरसों बाद जब मैं अपने घर वापस उसी कमरे में गयी 
तो मुझे कुछ नज़र न आया 
रौशनी तो अब भी है वहां मगर ना कोई परछाई, ना ही कोई साया
हाँ बस इमारते बन गयी है, पुस्तकों की नहीं मगर कुछ लोगो ने वहां सुपर-मार्किट बना दिया है

लोगो ने बताया की यहाँ रहने वाले सभी लोगो का तबादला हो गया था
तो सरकार ने इस मोहल्ले को हटा कर मॉल बनाने का हुक्म दे दिया

सोचती हूँ …
क्या वो आज भी यहाँ आता होगा, 
भनक भी होगी उसे मेरे इस रवैये की

बस, 
आज भी रात को झांकती हूँ मैं 
अपने बंद कमरे की खिड़की से

One thought on “बंद कमरे की खिड़की से

  1. zindagi ki raftaar me jo na badle wo kya buzdil ya nadaan h.. jo hai iss duniya ka uska na badalna kya nikaas h.. haan hai kch chije jo na badalti h ..haan hai aisi chije jo na jalti h .. bs dekh kr lgta kya wo bhi mujhe dekhta hoga .. kya usne bhi kabhi socha hoga. pr milta nahi wo jise jisko soch kr hm tarsa krte the ..jise dekh kr hm muskaraya krte the .. han badal gya wo manzar ..han badal gye nazare pr tujhe kaise lge pta ki wo bhi tujhe chup chup kr dekha aur muskuraya krta tha…

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